पर आशिक़ मिज़ाज़ ना समझना.....
के प्यार तो है तुझसे हद तक....
पर इस प्यार को तू अब प्यार ना समझना....
हैं गवाएं तेरी चाहत में....
मान मर्यादा....वो शौहरत....वो इज़्ज़त....
के जो तेरा दीदार करने को.....
घंटो तेरी राह देखा करता था.....
अब तू उस आशिक़ के दीदार में....
अपनी रूह को ख़यालो का ग़ुलाम ना करना...
है अफ़सोस तो मुझे इस बात का....
के तुझे इल्म भी ना रहा अपनी ही बात का...
मेहज़बीनी से लबालब....
और कातिल से तेरे अंग अंग......
के घमंड ने तेरी आबरू तक को नीलाम किया....
गलती की....वफ़ा की उम्मीद की...
बेरुखी थी तुझसे...फिर आखिर क्यों की...
सायद तेरी याद में आँखों से अश्रु छलके होंगे...
पर अब तू उस आँसू में खुद को तलाश ना करना....
दिया हुआ दर्द तेरा....जो कभी मेरा था....
तो सुन.....तू..... एै मेरे रुक्सार...
तू अपनी झोली में झाँक.....
वहां खुशियों की जगह.... अब दर्द का बसेरा था....
ना कोई रौशनी...ना कोई उम्मीद...
तेरे आगे भी अब अँधेरा था...
हर बार कहा तुझसे.....मेरी एक बात तू कभी ना भूलना.....
तेरा आशिक़ हु ज़रूर....
पर आशिक़ मिज़ाज ना समझना....
मुझे आशिक़ मिज़ाज ना समझना.....








































